हम हर दिन हवा में एक पत्थर उछालते हैं पूरा दम लगाकर। पत्थर नीचे गिर जाता है। उसकी रूह मगर हवा में तैरने लगती है। पत्थर इन्विज़िबल है पर उसकी जो रूह है वो है नारंगी रंग की। जब सूरज डूबने लगता है तो मेरे प्यारे पत्थर की रूह सूरज से लिपट जाती है। दुनिया के काली नज़र से चाँद पर धब्बे पड़ चुके हैं, ये उसे पता है। इसलिए वो अकेले सूरज को बचाना चाहती है अपने बल बूते पर।
वो नीचे आती है...
:)

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Saturday, 18 November 2017
Saturday, 10 June 2017
तो बस यूँ हीं।
हमारी फ़्रेंडलिस्ट में आपको देश के ऑलमोस्ट हर कोने के रिप्रेजेंटेटिव मिल जाएँगे। फिर चाहे वो लेह हो या फिर सिक्किम। साउथ के भी हैं, और कश्मीरी भी है। नेपाली भी हैं तीन ठो! पर सबसे ज़्यादा उत्पात हमारे जीवन में जो कहिये, इन यूपी वालों ने मचा रखा है। इतने तो बिहारी भी हैपनिंग नही हैं हमारे जीवन में, जितने ये हैं। ऊपर से ये दिल्ली वाले तो हाय! क्या ही ख़ूब हैं। कोई...
Sunday, 21 May 2017
शोर और सन्नाटा
सुनो, सन्नाटे में एक आवाज़ गूँज रही है, बहुत कोशिश की मैंने कि मैं समझ सकूँ की ये आवाज़ किसकी है और क्या कहना चाह रही है। पर थक चुकी हूँ, सन्नाटे से भी और उसे चीर कर रख देने वाले इस शोर से भी।
सुनो, आज मैं रात भर जगी रही, दिन में आज इसलिए ज़्यादा सो गई थी मैं, पर न शोर हुआ न सन्नाटा। न रात हुई न सुबह। बोलो, ऐसा भी भला कभी होता है क्या कि रात आँखों से उतरते-उतरते कहीं नाभि तक पहुँच...
Monday, 27 March 2017
धब्बा
'स्याही है, काली, श्याम वर्ण।'
कागज़ है, सफ़ेद, धारियाँ हैं जिसपर।
'अब क्या?'
कुछ लिखना है?
'क्यों?'
अंदर दो-चार दिनों से पता नहीं कुछ हो गया है।
'लिखने से क्या हासिल होगा?'
शायद शान्ति मिले, शायद नहीं। क्या पता जो कोहराम अंदर मचा है, वो कागज़ पर यूँही उतर कर शांत हो जाए।
'ओह! अच्छा। लिखोगी क्या पर?'
लिख देंगे की कैसे अगर कोई अंदर झाँकेगा तो एक कोने में बस सिकुड़ कर बैठा काला सा एक...
Tuesday, 14 February 2017
भोलेनाथ
देखिये पुराणों से जुड़ी है ये घटना, शिव पुराण तो मैंने पढ़ा नहीं, न ही कभी शिव कथा को पूरी तरीके से पढ़ा या सुना है पर आज अचानक से फेसबुक वॉल पे घूमते-घूमते शिव जी की इक तस्वीर आँखों के सामने आ गयी और साथ ही साथ नानी की वो कहानी भी।
तो हुआ यूँ की इक बार महालक्ष्मी शायद ऐसे ही किसी अलसायी सी दुपहरी में बैठी श्रीविष्णु के चरण-कमल दबा रहीं थी। अब बोरियत तो हो ही जाती...
Thursday, 2 February 2017
बेंच से उठ के केबिन तक।
छः पचपन की ट्रेन पकड़ कर
मैं सोम से शुक्र आता हूँ।
फिर नौ बजे दफ़्तर पहुँच
उस बेंच पर बैठ जाता हूँ|
बगल मे मेरे बैठी रहती
काली सी एक बैग मेरी।
नाति-पोतों ने अब जिसे
नाम दे दिया "बैगवती"।
अब तो राम सिंघ भी
चाय बिस्कुट पूछ आता है।
हर रोज़ दफ़ा दो बार वो
मुझे देख मुस्कुराता है|
कभी कभी यूँ बैठे-बैठे
मैं इस सोच में पड़ जाता हूँ।
क्यों खुद को इस राह में मैं
निरीह अकेला...
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