Sunday, 30 October 2016

सूटकेस

कल दोपहर मिली मुझे उपर के माले  में रखी एक सूटकेस| धूल की एक परत  जमी थी उसपर| उसके काले रंग पर चमकता सफेद सा  वी.आई.पी का लोगो, जो आज भी वैसा था, जैसा सालों पहले कभी।    उसे निचे ले आई मैं और बस लौट गई। कहाँ?  बीते कल में। खो लिया खुदको अपने उस बचपन में। फिर खोलकर उसे बैठी, और सामान सारे पसार कर ढूढंने लगी कुछ-कुछ। फिर मिली मुझे...

Wednesday, 19 October 2016

And then...

And then the metal clenched around my wrist, in a way it never did before. I looked around, taken aback by such a weird way in which the bracelet has responded. it was the last thing you gave to me, I still remember how you stood there at the doorway looking at me half asleep, half awake, trying to get done with the awful day i was having. you whispered my name, I know it was...

Wednesday, 14 September 2016

प्रिये!

तुम मेट्रो के ए.सी. डिब्बे से, मैं लोकल की टूटी सीट प्रिये। तुम जार हो फ्री न्यूटेला के, मैं जैम की सीसी खाली प्रिये। तुम कोलाहल के आंधी से, मैं मुट्ठी भर बरसात प्रिये। तुम उजियारा दिनकर का, मैं निपट अँधेरी रात प्रिये। तुम बोतल सील पानी के, मैं दो टके की गिलास प्रिये। तुम रास में डूबे गिरधारी , मैं गोपी तुमपे मतवारी प्रिये। तुम उड़ते नभ् में रहने...

दौर दफ़्तर-दफ़्तर दौड़ का |

किस दफ्तर अब मैं जाऊँ कहाँ अपनी गुहार लगाऊँ? किस अफसर के बैठ सामने मैं घंटों तक रपट लिखाऊँ? किस मुंसी की जेब में डालूँ नोट करारे एक से पाँच?  किस टेबल के किस कोने में  रख दूँ थोड़े भेट-सौगात? अब याद नहीं हूँ कबसे बैठा इस खिड़की वाले बेंच पे मैं| साथ मेरे है ये टूटी चप्पल रोज़ बनवाता हूँ मैं जिन्हें|  भौंहे चढ़ाया था जीवन भर हर बार बदलते शासन  पे था...

Tuesday, 26 July 2016

मेरी मुट्ठी

मेरी छोटी सी दायीं मुट्ठी , और इसमें बंद बड़े से तुम| तुम्हारे ये बड़े-बड़े ख्वाब इन ठिगनी उँगलियों में उलझे| और इनकी नाज़ुक सी गिरफ्त जिसमे कैद तुम्हारी जिंदगी| पकड़ ढीली महसूस कर, फिसल जाते तुम्हारे अरमान| और गिरते ज़मीं पर ''धप्प!'' दबोचकर फिर उठाती मैं उन्हें, हौले से सहला उन्हें बहलाती और मुट्ठी में बंद तुम्हे सौंप देती| तुम छिटपिटाते बाहर आने को  पर...

Thursday, 12 May 2016

My obsession with 2 AM people

Earlier, well like two seconds ago,the title for this post didn't have 'people' at its end. Why did I add it? Well to simply make it clear what I mostly mean when I refer to 2 AM. Though it's the quietest part of the night and the most peaceful too. Lights are mostly out. Birds don't chirp around like the way they do, say at 4 AM or something. Even the sky is completely black,...

Saturday, 12 March 2016

लौट यहीं फिर आना तुम

उन क़िस्सों से जब थक जाओगे लौट इस दर पर आना तुम| बातें करनी सीख ली होंगी तो दिल का हाल सुनाना तुम| क्या-क्या खोया क्या है पाया सब मुझको बतलाना तुम| गर इश्क़ किया था सच्चा हमसे तो फिर से छोड़ ना जाना तुम| बीते बिसरी बातों को बस लबों पर ना ले आना तुम| ख्वाबों मे गुम हो जाने का वो तरीका मत अपनाना तुम|    आँखों मे आँखें डाले शिकवे सारे...

Wednesday, 20 January 2016

Life Happens

"It's hard to Delete a number, Ignore a call, Deactivate account, Unfriend someone. Moving on and erasing that person from your heart seems impossible. But it isn't impossible." Come out of your shell. Reach out to others. Wake up. Because its just a trance. All that dreams you saw was just an illusion. All that future planning of yours was just a distraction. You have to realize...