तुम मेट्रो के ए.सी. डिब्बे से,
मैं लोकल की टूटी सीट प्रिये।
तुम जार हो फ्री न्यूटेला के,
मैं जैम की सीसी खाली प्रिये।
तुम कोलाहल के आंधी से,
मैं मुट्ठी भर बरसात प्रिये।
तुम उजियारा दिनकर का,
मैं निपट अँधेरी रात प्रिये।
तुम बोतल सील पानी के,
मैं दो टके की गिलास प्रिये।
तुम रास में डूबे गिरधारी ,
मैं गोपी तुमपे मतवारी प्रिये।
तुम उड़ते नभ् में रहने...
:)

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Wednesday, 14 September 2016
दौर दफ़्तर-दफ़्तर दौड़ का |
किस दफ्तर अब मैं जाऊँ
कहाँ अपनी गुहार लगाऊँ?
किस अफसर के बैठ सामने
मैं घंटों तक रपट लिखाऊँ?
किस मुंसी की जेब में डालूँ
नोट करारे एक से पाँच?
किस टेबल के किस कोने में
रख दूँ थोड़े भेट-सौगात?
अब याद नहीं हूँ कबसे बैठा
इस खिड़की वाले बेंच पे मैं|
साथ मेरे है ये टूटी चप्पल
रोज़ बनवाता हूँ मैं जिन्हें|
भौंहे चढ़ाया था जीवन भर
हर बार बदलते शासन पे
था...
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