Thursday, 20 December 2018

कमरा

हम जो लिखना चाहते हैं, वो ये नही है। वो न तो कोई कहानी है न प्रसंग है। अगर कुछ है तो बस व्यथा है उस आदमी की जो एक अँधरे कमरे में फँस गया है और छू कर देख रहा है दीवार की सतह को, खोज रहा है कोई किवाड़ या खिड़की या फिर कोई छेद ही हो जिसे चूहों ने बनाई होगी; पर न आँखों को कुछ नज़र आ रहा होगा, न उसके हाथ ही कुछ देख पा रहे होंगे। अगर कमरे में कोई और होता, जो बिना रोशनी के देख सकने...

Thursday, 16 August 2018

The Crack

Hopped up on my 12:43 Metro Train, in the tunnel just before my station, I see a caged bulb placed on its wall. The cracks around it, runs quite deep,  and has its edges smothered by pain the pain of witnessing countless faces pass by  and not knowing what happens to them. The pain of not knowing how the faces shine when the ray of sun falls on them. The pain...

Friday, 20 April 2018

खिलौना

कमरा छोटा है... डार्क ऑरेंज रंग के पर्दे हवा की वजह से नाच रहे, थोड़ी रोशनी आ रही है  उनके खिड़की से हटने पर। फर्नीचर जो कि यूँ तो नॉन एक्सिस्टन्ट हैं,  धीरे-धीरे फ़ोकस में आ रहे हैं। एक स्लेटी रंग का स्टूल है जिसपे एक लैंप रखा है। उस लैंप से पीलिया फैल रहा है इस कोने से उस कोने तक। कमरे के बीच में एक लकड़ी की कांफ्रेंस टेबल है जिसपे एक खिलौना रखा है, प्लास्टीक का, चटक...