Monday, 27 March 2017

धब्बा

'स्याही है, काली, श्याम वर्ण।' कागज़ है, सफ़ेद, धारियाँ हैं जिसपर। 'अब क्या?' कुछ लिखना है? 'क्यों?' अंदर दो-चार दिनों से पता नहीं कुछ हो गया है। 'लिखने से क्या हासिल होगा?' शायद शान्ति मिले, शायद नहीं। क्या पता जो कोहराम अंदर मचा है, वो कागज़ पर यूँही उतर कर शांत हो जाए। 'ओह! अच्छा। लिखोगी क्या पर?' लिख देंगे की कैसे अगर कोई अंदर झाँकेगा तो एक कोने में बस सिकुड़ कर बैठा काला सा एक...