मेरी छोटी सी दायीं मुट्ठी ,
और इसमें बंद बड़े से तुम|
तुम्हारे ये बड़े-बड़े ख्वाब
इन ठिगनी उँगलियों में उलझे|
और इनकी नाज़ुक सी गिरफ्त
जिसमे कैद तुम्हारी जिंदगी|
पकड़ ढीली महसूस कर,
फिसल जाते तुम्हारे अरमान|
और गिरते ज़मीं पर ''धप्प!''
दबोचकर फिर उठाती मैं उन्हें,
हौले से सहला उन्हें बहलाती
और मुट्ठी में बंद तुम्हे सौंप देती|
तुम छिटपिटाते बाहर आने को
पर...
:)

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Tuesday, 26 July 2016
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