Tuesday, 26 July 2016

मेरी मुट्ठी

मेरी छोटी सी दायीं मुट्ठी , और इसमें बंद बड़े से तुम| तुम्हारे ये बड़े-बड़े ख्वाब इन ठिगनी उँगलियों में उलझे| और इनकी नाज़ुक सी गिरफ्त जिसमे कैद तुम्हारी जिंदगी| पकड़ ढीली महसूस कर, फिसल जाते तुम्हारे अरमान| और गिरते ज़मीं पर ''धप्प!'' दबोचकर फिर उठाती मैं उन्हें, हौले से सहला उन्हें बहलाती और मुट्ठी में बंद तुम्हे सौंप देती| तुम छिटपिटाते बाहर आने को  पर...