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Monday, 27 May 2024
Thursday, 1 June 2023
क्यों होती हैं रातें
Thursday, 20 December 2018
कमरा
Thursday, 16 August 2018
The Crack
in the tunnel just before my station,
shine when the ray of sun falls on them.
what actually happened when time had
seeped through its polished surface smoothly
at first
creating fissures and breaking the wall on its
way, it wanted to find what lay beneath the wall,
wished to feel its pulse, the way it could
sense the faint thud on a human flesh, just before
life perished once and for all. Let us call time T
for its running out from all of us. We are nearing the
T - X
oblivious to its strength, and its true intentions.
Time was never a healer, yes, it did make us
numb towards pain and heartbreaks, towards
sorrow and soul wrenching memories. It dulled
the memories, covered them with a translucent sheet
so that upon recalling, we can only trace the hazy
outlines
of a past we once lived, thrived and died in.
But the Wall, unaware of it all, confused to
its might, keeps looking at this thing which
wooshes past itself, with faces packed in it.
some, looking back towards it absentmindedly,
some waiting for the tunnel to end, and a few,
staring back
at it, with utter confusion, the same delusions
in the back of their head. The ones who are
trying to run away, from situations they are in,
praying to the mischievous God of Healers, T,
to take their pain away, these are the Faces at which
Time stares back too, bit frequently, through the
cracks.
Friday, 20 April 2018
खिलौना
कमरे के बीच में एक लकड़ी की कांफ्रेंस टेबल है जिसपे एक खिलौना रखा है, प्लास्टीक का, चटक हरे रंग का है। टेबल के इर्द-गिर्द छः कुर्सियाँ हैं, गद्दे वाली। एक किताब है, उसपे चाँद बना है, उससे गुलाब की खुशबू निकल कर टेबल के हर इक डेड सेल को ज़िंदा करने की जद्दोजहद कर रही है।
एक काले शर्ट वाला आदमी पहली कुर्सी पर आ कर बैठ गया है। परेशान है। उँगलियों के बीच सस्ती सी सिग्रेट है। उसके मुँह से बदबू आ रही परसों पीये हुए शराब की। शायद उसने अब तक वही शर्ट पहनी है जिसपे दो घुट गिर गए थे,जब उसके हाँथों से बोतल गिर कर टूटने वाली थी। उसके जीन्स पर मिट्टी की परत है। वो सड़क पर लेट गया होगा पर सामने से कोई गाड़ी आई नहीं होगी। कोई टेम्पो वाला उसे कुचल कर गायब न हो सका। सैड!
खिलौनें में चाभी है, घुमाने पर वक़्त बताती है। आदमी चाभी घुमाता है। खिलौना कहता है "द टाईम इज़ फॉरटी फाइव हॉर्स थ्री सेकण्ड्स।" आदमी सिरियस हो जाता है। पाँच जनें धरल्ले से कमरे में घुसते हैं। उनके चेहरे पे अजीब से दाग हैं, एकदम घिनौने से, वे कभी सुंदर नहीं कहलाएँ होंगे, उनकी कुरूपता को मद्देनज़र रखते हुए उनके हुलिये की बात नहीं होगी। वो सब बैठ जाते हैं।
वो सारे उस आदमी को समाज के नियम याद करवा रहे हैं। एक-एक वो दोहरा रहा। उसके हाँथों में निशान है। शायद जल गए थे जब वो दुनियाँ में आग लगा रहा था अपनी स्याही उड़ेलकर। पर फिर एक दिन एक लड़की आ गयी। और उसके झुमके में टंगी घुंगरू, जिसमें बर्बादी रहती थी, उसके ज़िन्दगी में गिर गई। तबसे उसके हाँथ जल जाते है। वो उस लड़की को भूलना चाहता है। पर वो लड़की है सबसे बेहूदी किस्म की। वो तमाम प्रपंच करने पे बहुत याद आती है। और नहीं करने पर वो ख़ुदको उसकी गोद में पाता है। वो साक्षात चुड़ैल ही है समझो; पर उसकी हँसी बहुत प्यारी है, तो बस वो उससे प्यार करता है।
वो अब ज़ोन आउट कर रहा है। उसके सामने बैठे मनहूस लोग उससे कह रहे हैं उनकी बातें सुनने को। वो सुन रहा है। पर ध्यान नहीं दे रहा। (ही चकल्स।) वो फिर चाभी घुमाता है। घड़ी के अनुसार चार साल बीत गए हैं। अब वो उस क्लॉस्ट्रोफिबक गड्ढे से बाहर निकल रहा है। उसे भूख लगी है। समाज की सुन सब समझने के बाद वो निर्णय ले चुका है अपने आने वाले सुनहरे भविष्य का। वो सीधा उस लड़की के घर जाएगा। उसकी हाँथों की रेखाओं को कहेगा कि उसके लिए कोई नाइ बर्बादी पकाएँ। तब तक वो बिठाएगा उसे अपने सामने और घंटों तक रोता रहेगा बिना आँसुओं के। फिर पीयेगा ज़हर उस लड़की की लकीरों के कहने पर। और फिर ज़िंदा हो जाएगा।
कमरे में फैली हुई पीली लाईट को लैंप वापस सोख रही है। पर्दा ख़ुदको अलाइन कर रहा। खिलौने की चाभी घुमती है रिवर्स में अपने आप और लड़की जग जाती है। चादर को छू कर देखती है, गीली है। उसने पंखा नहीं चलाया होगा। वो ख़ुद को कहती है कि "जो देखा था बस नाइटमेयर था।" हालाँकि बिस्तर के नीचे कुछ जॉइंट्स पड़े है पर उसने तो हैल्युसिनेट किया ही नहीं कभी। वो आदमी उसके बगल में सो रहा है।कितना प्यारा लग रहा है। वो उससे प्यार करती है। पर वो उसे मार देगी एक दिन। वो आदमी तभी खुश रह सकेगा।
Saturday, 18 November 2017
पत्थर की रूह
Saturday, 10 June 2017
तो बस यूँ हीं।
कोई ख़ास मतलब नही है इस पोस्ट का पर क्या करें। हम भोलेनाथ के भक्त हैं और इंडिया इस अ डाइवर्स कंट्री, जहाँ सबकी रिस्पेक्ट होती है।ठीक वैसे ही जैसे मोर आजीवन "वहमचारी" बनकर रहते हैं। हमें लगता है हम थोड़े लेट हो गए हैं और ये जोक पुराना हो गया है। वो दरअसल हुआ यूँ कि हम कुछ पुराणों का अध्यन कर रहे थे।
कौनसे पुराण? अरे भाई आपको नाम तो नही बता सकते। गर्ल कोड ब्रो! पर हाँ ये ज़रूर कह सकते हैं कि उसमें क्या कहा गया है। सबसे पहले पन्ने पर हमें शपथ दिलाई गई कि हम जो पढ़ेंगे, उसकी चुगली-चपाटी लड़कियों के अलावा किसी से नही करेंगे। पर हमने बचपन से ही इतनी विद्या कसम तोड़ी है कि नतीजा ग्यारवीं के रिजल्ट से दिख गया हमको। तो बस लॉल। हाँ जी बहनजी, आगे बढ़ते हैं, पहला अध्याय कहता है कि 'हे गई दाय, (ओ बहन) वचन लो कि आजीवन वचनों से बँधी रहोगी। ख़ुद भले ही टूट जाओ, पर इन वचनों को मत तोड़ना।
दूसरा अध्याय हमें सईंयम का पाठ पढ़ाता है और कहता है, 'गई बेटी, (हे पुत्री) वचन लो कि चाहे लोग तुम्हें मार दें, या गाड़ दें, तुम गलती से भी आवाज़ मत उठाना। जब तुम पैदा हुई थी और रोई थी, तब तुम्हारी वो रुदन ध्वनि हमें बर्दाश्त नही हुई थी। और हम तुम्हें कभी आँसुओं में नहीं देख सकते तो तुम बस खून के घूट पी लेना, (क्वाईट लिटरली!) पर हमारे सामने रोना मत।
तीसरा चैप्टर बहुत लंबा था तो हमने छोड़ दिया, हाऊ बोरिंग! पर बेसिकली हमें ये बताया गया है कि हम कैसे समाज के, हालात के, वक़्त के, सौदागरों के, वहशियों के, और ख़ुदके कैदी बनकर इस लंबी जिंदगी को भी काट सकते हैं, बिना हाँथ के नसों को पाँच मर्तबा काटे। सो स्वीट। काफ़ी सोच-समझ के लिखा गया था ये, है कि नहीं?
देखिये हमारा बोर्डस है इस साल, तो हम टाईम अपना यूँ आप जैसे समझदार लोगों पर खर्च नही करेंगे। आप सब संस्कारी हैं, सही मायनों में अजुकेटेड हैं। फ्रीली सेक्स की बातें करते हैं कॉज़ व्हाई नॉट, भाई हम मॉडर्न हैं, रिप्रोडक्टिव हेल्थ, हम्म हम्म, कॉपर टी, सेफ सेक्स, जैसे मुद्दों को उठाते हैं, स्टिग्मा तोड़ते हैं। दबी आवाज़ों में अपनी आवाज़ मिला एक ऐसा शोर मचाते हैं जो चीन के दीवार को भी भेद दे पर शायद हमारे माई-बाप तक न पहुँचे।
अच्छा? आप ऐसा नही करते? तो ठीक है, कम से कम आप अपने काम से मतलब रखकर किसी अफवाह फैलाने में सबसे आगे तो नहीं दौड़ते ना, कम से कम अपनी जिंदगी संभालते वक़्त कंधा तो देते ही होंगे उन्हें जिन्हें ज़रूरत हो। आप आगे बढ़ते वक्त पिछड़ों को साथ लेकर चलते होंगे। या शायद खाली हाथ आएँ हैं हैम, झाली हाँथ जाएँगे बालू सोच है आपकी और आप बस ख़ुदसे मतलब रखते हैं। वो भी नही?
तब तो आप ज़रूर शूटर ही होंगे मेरी जान। ये बैठे स्क्रीन के पीछे और दे दनादन फेंके शब्दों के बाण सरकार पर, मर्द जात पर, औरतों पर, यूथ पर, अपने पड़ोसी पर, उसकी बीवी पर या पति पर, या अपने घर के अन्नदाता पर, विधाता पर। कभी तो आप हाथ में कटारी लेकर अपने पेट पे लगा देते होंगे और चिल्लाते होंगे कि हाय रे आपकी किस्मत जो आप कुछ नही करते, आप समाज में रहने के लायक नही हैं। पर आप फिर भी कुछ नही करेंगे, दुनिया से अटेंशन मिल गयी एक दफ़ा,तो आप कटारी वापस ड्रावर में रख देते हैं संभाल के। और वापस बैठ जाएँगे स्क्रीन के पीछे, स्मोकिंग किल्स वाली पोस्ट को शेयर करेंगे और छोड़ेंगे एक कश हवा में, 'फू'। खैर कोई नही।
देखिये सेक्स से याद आया (शेम-शेम पप्पी शेम), क्या ही कुलक्षण वाली बात कह दी मैंने, कई के हाथ से चाय का कप गिर गया होगा "ओह माय माता!", पापा लोग अपनी भौंह चढ़ा चुके होंगे, भाई लोग सकते में आ गए होंगे, छोटे बच्चे मुँह पर हाँथ रख कर हिहि-ठिठि करने लगे होंगे दबी आवाज़ में। वाह रे रिएक्शन! खैर, तो हाँ, सेक्स से याद आया कि फीमेल कॉन्डम का इस्तेमाल क्या मोरनी भी करती होगी? मतलब आँखों में लगा लेती हो शायद! जस्ट किडिंग! जाओ गूगल करो। अब क्या हमही बताएँ की क्या पूछोगे गूगली बहन से?
Sunday, 21 May 2017
शोर और सन्नाटा
Monday, 27 March 2017
धब्बा
'स्याही है, काली, श्याम वर्ण।'
कागज़ है, सफ़ेद, धारियाँ हैं जिसपर।
'अब क्या?'
कुछ लिखना है?
'क्यों?'
अंदर दो-चार दिनों से पता नहीं कुछ हो गया है।
'लिखने से क्या हासिल होगा?'
शायद शान्ति मिले, शायद नहीं। क्या पता जो कोहराम अंदर मचा है, वो कागज़ पर यूँही उतर कर शांत हो जाए।
'ओह! अच्छा। लिखोगी क्या पर?'
लिख देंगे की कैसे अगर कोई अंदर झाँकेगा तो एक कोने में बस सिकुड़ कर बैठा काला सा एक जीता-जागता धब्बा मिलेगा।
'एक बात बताओ, तुम कहती हो ख़ुद हमेशा की तुम काली हो भीतर से, फिर उस काले रंग के कैनवास पर, ये काला धब्बा कैसे दिखेगा?'
मेरे अँदर का कालापन, जो मेरा है, मुझे मुझसे दूर नहीं करता। बस जब-तब मुझे अपनी आग़ोश में ले लेता है। मैं इसे ओढ़ कर खुद को सुरक्षित महसूस करती हूँ। इसमें एक अपनापन है। अनंतकाल तक ये मेरे साथ रहेगा, मेरी परछाईं की तरह, जो भी काली है देखा जाए तो,ऐसा मुझे हमेशा लगता है। ऐसा नहीं की ये कालापन मुझे भीतर से खोखला कर रहा है या किसी और रंग से, एहसास से या हालात से मुझे वंचित रख रहा हो। "अल्टीमेट रिसेप्टर" है मेरा कालापन। हर ख़ुशी से भरी मुस्कराहट, हर ग़म के आँसू, विचलित मन के कारण तनी हुई भौंहों के पीछे की हर इक वजह को ये ख़ुद में समा लेता है। जब बाहर की दुनिया में रात काले आसमान को लाती है, तब मेरे भीतर की काली दुनिया मेरा हाथ पकड़ मुझे बैठाती है, और फिर मेरे हर इक एहसास से मेरा परिचय करा, मेरी हर बीती मुझे फिरसे बता, अपनी बाहों को फैला, मेरे हर रीसते हुए ख्वाब को, इक गठरी में बाँध कर, ये कालापन अपने भी और भीतर ले कर कहीं चला जाता है।
'अरे, फिर तो तुम्हारे भीतर इक ब्लैक बॉडी है, तुम्हारी चमड़ी के नीचे।'
हाँ है तो, पर कहाँ वो तो नहीं पता, पर जहाँ भी ये सब मन-वन है, वहीं होगी ये ब्लैक बॉडी।
'पर फिर, ये काला धब्बा अब तक तुम्हारी ब्लैक बॉडी में शामिल कैसे नहीं हुआ अब तक?'
ये जो काला धब्बा है न, वायरस है शायद कोई, इसकी "रिपेल" करनी की शक्ति बहुत ज़्यादा है। ये न, अपने आसपास के कालेपन से हिलने-मिलने की कोशिश भी नहीं कर रहा। बस मुँह फुलाये बैठा है कोने में। जो कोई एहसास इसकी ओर बढ़ने को कोशिश करे, तो उसे खदेड़ देता है।एहसासों को छोड़ो, इसे न ख़्वाब की कद्र है, न ख़्यालों की। अरे ये तो उस कालेपन को भी काटने को दौड़ता है जो मेरे भीतर न जाने कब से विलीन है। अब बताओ, न मैं इस धब्बे को मिटा सक रही हूँ, न इससे मुझे चैन मिल रहा, और ये अगर भीतर रह गया, तो ये सब ख़ाक कर देगा। सब मिटा देगा।
'ये धब्बा तो महादेवी वर्मा की "कुब्जा" बन गया है।'
भक्क।
'सुनो, तुम तब मिट जाओ।'
हाँ?
'ढाई पन्ना भर दिया तुमने,लिखते-लिखते। अब मत लिखो। बाहर दिन देखो, उजली है। तो तुम भी इस चिड़े हुए काले, बेरंग धब्बे को कोई उजली लोरी सुना दो।'
कर के देख लेती हूँ ये भी, इसे सुला देती हूँ। फिर जब ये गहरी नींद में सो रहा होगा, जिसमे न सपने होंगे न साँस, शायद तब मेरी ये ब्लैक बॉडी ही अपना काम कर ले। इस काले विचित्र धब्बे को खुदमें बसा ले।स्वीकार ही कर ले शायद तब ये धब्बा मुझे और मेरे कालेपन को।
'सुनो, पन्ना, भरा हुआ, धारी वाला, आढ़े-तिरछे अक्षर हैं जिसपर।'
हाँ, कलम, काली, काले स्याही अब शायद ख़त्म है जिसकी।
'अब क्या?'
अब कुछ नहीं लिखना है।
Tuesday, 14 February 2017
भोलेनाथ
जब कई मौसम और बीत गए और पुनः लक्ष्मी ने कहीं बाहर जाने की बात छेड़ी तो इससे पहले वे कहीं और जाने की ज़िद्द करती, विष्णु तपाक से बोल पड़े 'हे भाग्यवान, आप तो भाग्य बनाती या बिगाड़ती हैं, आप खुद क्यों मुझ पर बिगड़ रही हैं, कल नारद आये थे, बता रहे थे की कैलाश पे आज-कल कुछ नया हो रहा है, वहीँ चलते हैं, आप पार्वती से 'सफ़्फ़्रेज' मूवमेंट की बात कर लेना और हम तब तक महादेव के साथ कैलाश के दो चक्कर लगा लेंगे, सेहत का ख्याल रखना भी ज़रूरी है प्रिये, यूँ लेटे-लेटे हड्डियों में कोई नयी बिमारी आ गयी तो, वैसे भी आज कल पृथ्वी लोक पे आना-जाना काफी बढ़ गया है हमारा, क्या पता कौनसी नई 'कम्युनिकेटिव' बिमारी फैली हो, जो मुझे भी लग जाये। थोड़ी खुली हवा में टहलने से स्वास्थ अपने आप ठीक हो जायेगी।" फिर क्या, फिर वे चल दिये।
जैसा को हमेशा होता आया है, पार्वती जी के साथ माँ लक्ष्मी मानसरोवर के तट की ओर बढ़ गयीं और विष्णु आंजू-बांजू नज़र फेर कर मंद-मंद मुस्कुराते हुए शिव के बगल में विराजमान हो गए और बोले, "धन्य है आप महेश, आपने मेरी बात का मान रख। देखिये ये जो आपने फ़सल लगाई है, कितनी सुन्दर प्रतीत हो रही है, इस हलकी-हलकी हवा में झूम रहे ये तो किसी नवजात शिशु की किलकारी के समक्ष प्रतीत होते हैं।" शिव फिर बस मुस्कुरा दिए! न जाने वायु देव को क्या सूझा, वे फसलों में से होते हुए, जहाँ देवादि देव विराजे थे, उस ओर बहने लगे, फिर क्या, पीताम्बर को के स्वांसों में एक अलग ही खुशबु मिश्र होने लगी और वे थोड़ा चौंक ',हे प्रभु, ,आज तो आप चिलम का भी प्रयोग नहीं कर रहे, फिर ये महक कैसी?" भोले नाथ ने बड़ी भोली सी शक्ल बना कर साफ़ साफ़ उत्तर दे दिया, "हे सृष्टि के पालनहार,आपने ही तो कहा था की जिसकी ज़रूरत हो, उसकी खेती कर डालूँ , अब इतने सारे गण हैं, इतने सारे साधू सन्यासी, उनकी ज़रूरर्तों को पूरा करने के लिए मैंने भांग की खेती ही कर दी, इनसे उनकी भी जरुरत पूरी हो गयी और मेरी भि।" उनके इस उत्तर को सुनकर विष्णु अचंभित हो गए और नतमस्तक होकर बोले, हे उमानाथ, आपसे भोला नै कोई हुआ है, ना कोई होगा, आप धन्य हैं प्रभु"। बस बात कुछ और चली, नेताओं की चर्चा, शान्ति की चर्चा, मोह की चर्चा, माया की चर्चा और जब इन चर्चाओं पे विश्राम लगाने का वक़्त आया तो लक्ष्मी और विष्णु को विदा कर, महादेव ने अपनी पलटन को बुलाया और नंदी के पीछे- पीछे अपनी खेतों में चल दिए।
बस कहानी खतम। पैसा हज़म।
Thursday, 2 February 2017
बेंच से उठ के केबिन तक।
मैं सोम से शुक्र आता हूँ।
फिर नौ बजे दफ़्तर पहुँच
उस बेंच पर बैठ जाता हूँ|
बगल मे मेरे बैठी रहती
काली सी एक बैग मेरी।
नाति-पोतों ने अब जिसे
नाम दे दिया "बैगवती"।
अब तो राम सिंघ भी
चाय बिस्कुट पूछ आता है।
हर रोज़ दफ़ा दो बार वो
मुझे देख मुस्कुराता है|
कभी कभी यूँ बैठे-बैठे
मैं इस सोच में पड़ जाता हूँ।
क्यों खुद को इस राह में मैं
निरीह अकेला ही पाता हूँ?
बात किसी बुधवार की है
जब लंच के समय मैं बैठा था।
ऊंघ रहे थे चपरासी सारे
और मैं फिरसे वहीँ जरा लेटा था।
इतने में कंधे पर मेरे
किसी ने अपना हाँथ रखा।
और न जाने कैसे पर ये
विचलित मन थोड़ा शांत हुआ।
पलट के जब देखा मैंने
तो खड़ी वहाँ एक लड़की थी।
आँखों में एक आग था उसके,
जो शायद मुझे देख के भड़की थी।
प्यार से उसने पूछा मुझसे
"बाबा यहाँ क्यों बैठे हो?
काम कोई क्या है तुम्हारा,
जिसके लिए बेंच पर यूँ लेटे हो?"
अश्रु की दो धार न जाने
कैसे आँखों से बह आई।
जो कुछ बीती थी अब तक
वह सब वो ज़ुबाँ पर ले आई।
"साथ चलो तुम मेरे।" कहकर
बैग मेरा काँधे पर लिया।
हर चपरासी को देखकर
उसने तन्द्रा अपनी भंग किया।
तो पहली मंज़िल पर
और हाँ, सामने फाइल मेरी
एक शीशे के टेबल पर थी।
जिसके परे वह अफसर बिटिया
मुस्काती हुई बैठी थी।
Sunday, 30 October 2016
सूटकेस
और बस लौट गई।
कहाँ? बीते कल में।
खो लिया खुदको
अपने उस बचपन में।
फिर खोलकर उसे बैठी,
और सामान सारे पसार कर
ढूढंने लगी कुछ-कुछ।
फिर मिली मुझे कविता मिरी
लिखी थी जो मुस्कुराने पर।
पन्ने मिले मुझे जिसपर
आड़ी-तिरछी लाइनें थी।
कुछ शब्द भी थे, और
रंगीन आकृतियाँ थी।
सच कहूँ तो बचपन था!
फिर क्या ? फिर सामान समेटा।
उस काले बक्से में रखा सबको।
फिर हैंडल पकड़ उसका धीरे से
मैं ऊपर के माले में ले गई उसे
और पीछे शेल्फ पर रख दिया ।
उफ़्फ़! बहुत भारी था वो।
आखिर एक अरसा ढो रहा था।
स्मृतियाँ कैद थी उसमे
वह तो कई राज़ छुपा रहा था।
भीतर अपने बचपन बचा रहा था।
सदा के लिये मुँह मोड़ लिया
Wednesday, 19 October 2016
And then...
Wednesday, 14 September 2016
प्रिये!
दौर दफ़्तर-दफ़्तर दौड़ का |
कहाँ अपनी गुहार लगाऊँ?
किस अफसर के बैठ सामने
(...अगले भाग मे ज़ारी)
Tuesday, 26 July 2016
मेरी मुट्ठी
मेरी छोटी सी ये दायीं मुट्ठी,
जिसमे कैद तुम्हारी जिंदगी|
Thursday, 12 May 2016
My obsession with 2 AM people
Saturday, 12 March 2016
लौट यहीं फिर आना तुम
जो सीखा होगा इन सालों मे,
वो बात पते की बतलाना तुम|
यादों की उन फुलझरियों से,
दिल की चिंगारी जलाना तुम|
Wednesday, 20 January 2016
Life Happens
Sunday, 6 December 2015
कॉफी
शाम तक राह देखती रही तुम्हारे आने का. आज उस शाम को बीते भी 4 शाम हो चुके हैं|
कहा था तुमसे की तुम्हारी खामोशी बर्दाश्त नही होती मुझसे, शायद मज़ाक लगा था तुम्हे| तभी तो एक बार भी ना कुछ कहा ना नज़र उहा कर देखा ही मुझे|
Weekly
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